पतझड़

घना जंगल, पतझड़ का मौसम था।
पेडोकी शाखाए, सुनी सुनी थी।
विलंबित ताल की लय पर,
इन विशाल वृक्षोके पर्ण,
जमीन की ओर बढ़ रहे थे।
जमीन को इन पत्तोके ढेर ने,
या फिर ढेर सारे पत्तोने ढक लिया था।
बीचमेंही कहिसे कोई पंछी,
चीख पड़ता।
डालीपे सुस्त पड़ा सर्प,
जीभ सरसराता।
बंदरो का समूह चीखते चिल्लाते,
पेडोपे नाचते हुए कहिसे आता
और फिर कही गायब हो जाता।
मैं झील थी,
समय दोपहर का था।
झाडियोको थरथराते कपकपाते,
बाघ आया पानी पीने, प्यास बुझाने।
मुझमे अपना प्रतिबिम्ब देखकर,
चौक गया, जरा डर गया।
फिर आँखे बंद कर,
पानी पीने लगा।
सुदूर मैदानपर हिरनोका झुंड,
उस उष्ण दोपहरमे प्यासा,
बाघ के जानेका इंतजार कर रहा था।
बाघ वहिपर सुस्ताया,
लेकिन चीखने वाले बंदरोसे
बचने के लिये,
जल्दही वहासे दफा हो गया।
हर्ष भरे मृग,
मुझपे प्यास बुझानेके लिए टूट पड़े।
हँसते खेलते उस झुंडने,
मुझे मटमैला कर दिया।
यह खेल,
कुछ समयतक चला।
और फिर अचानक,
कहिसे एक चीख सुनाई पड़ी।
घात लगाए उस बाघने,
एक हिरन मार गिराया था।
अपनी जान बचानेकी कोशिशमे,
वहा इक खलबली मच गई थी।
फिर सब शांत हो गया,
मैं स्थिर,अचल,पारदर्शी हो गई।
दोपहर का समय,मैं झील थी।
घना जंगल,पतझड़ का मौसम था।
                     
                               – अचलेय
                     (२५/अक्तुबर/२०१६)

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